स्त्री से देवी- अहिल्या बाई होल्कर – भाग 1 (ई -पुस्तक)

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लोकमाता देवी अहिल्याबाई होलकर पर केंद्रित यह कृति इतिहास भी है और उपन्यास भी अर्थात ऐतिहासिक उपन्यास है। इसमें उनके जीवनकाल के उपलब्ध प्रमाणिक तथ्यों सहित कल्पना का समावेश भी है। इसीलिए यह उपन्यास है अन्यथा इतिहास होता।

 

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लोकमाता देवी अहिल्याबाई होलकर पर केंद्रित यह कृति इतिहास भी है और उपन्यास भी अर्थात ऐतिहासिक उपन्यास है। इसमें उनके जीवनकाल के उपलब्ध प्रमाणिक तथ्यों सहित कल्पना का समावेश भी है। इसीलिए यह उपन्यास है अन्यथा इतिहास होता। 18 वीं सदी के अराजक और  व्यवस्था पूर्ण काल में जब भारतवर्ष के छोटे – छोटे राजाओं का आपस में ही संघर्ष चल रहा था, जनता दुखी, भयग्रस्त व त्रास्त थी और चोरों, डाकुओं व लुटेरों का आतंक व्याप्त था – तब उसी काल में देवी अहिल्याबाई ने अपने शासन में अपनी प्रजा को सुखी बनाया, आत्मनिर्भर किया, आतंक से  मुक्ति दिलाई तथा शासन प्रबन्ध का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया कि संसार के सर्वश्रेष्ठ शासकों में सर्वोच्च स्थान बनाकर अब तक ‘‘लोकमाता‘‘ के पद  पर प्रतिष्ठित हैं। देवी अहिल्याबाई होलकर भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान की दूर दृष्टा, अपने राज्य के अतिरिक्त समग्र भारतवर्ष के प्रमुख तीर्थ स्थलों में मन्दिरों की निर्माता, लोगों के विश्राम हेतु धर्मशालायें, ध्वस्त मन्दिरों की पुनः जीर्णोद्धारकर्ता, पथिकों हेतु पथों में पेयजल की व्यवस्थापक, यात्रियों के आवागमन सुविधा हेतु पथों का निर्माण, अनेकों स्थान पर सभा मण्डपों की निर्माता, तालाब, कुएँ, बावड़ियाँ खुदवाकर उनके रख रखाव की व्यवस्था, जन सुविधा हेतु विविध घाट निर्माण, बाग बगीचे, कुण्डों सहित दानधर्म का पालन करते हुए भूखों के लिये अन्नसत्रा, ब्राहृम्रणों, असहायों, गरीबों एवं आवश्यकता के पात्रों को उदारता से दान, नियमित सदावर्त के संचालन की स्थायी व्यवस्था, विद्या सम्पन्न व कलाकारों को उदार आश्रय,थलचर पशुओं हेतु चरागाह के लिये निःशुल्क चरनोई भूमि, नभचर पक्षियों के लिये करमुक्त फसल, जलचरों की क्षुधातृप्ति की शोधिका, नागरिकों की आवश्यकतानुसार जलमार्ग में नावों की प्रबन्धक आदि लोकोपकारी कार्यों का बुद्धिमत्ता, दूरदर्शिता, धर्मपरायणता, न्यायप्रियता, कार्य तत्परता, एकनिष्ठा एवं अनासक्ति भाव से तीस वर्षों तक शासन करते हुए अमर होने का कीर्तिमान अर्जित किया।

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