Composition (कृति) : “आद्धर सी हेटऽ तक”
Author (लेखक): जगदीश “ज़ोशीला”
Book length (पुस्तक की लंबाई): 46 Pages
Book Format (पुस्तक प्रारूप): E-book (ई-पुस्तक)
Language (भाषा): निमाड़ी
First Publication (प्रथम प्रकाशन): 2007
Country of Origin (मूल देश): INDIA(भारत)
Author (लेखक): जगदीश “ज़ोशीला”
Book length (पुस्तक की लंबाई): 46 Pages
Book Format (पुस्तक प्रारूप): E-book (ई-पुस्तक)
Language (भाषा): निमाड़ी
First Publication (प्रथम प्रकाशन): 2007
Country of Origin (मूल देश): INDIA(भारत)
‘करप्शन’ के बारे में कहा जाता है कि वह ऊपर से चलता है और नीचे तक छा जाता है। इसी को थीम बनाकर लेखक जगदीश “ज़ोशीला” ने निमाड़ी में “आद्धर सी हेटऽ तक” छन्द बद्ध काव्य रचना की है। ‘ “जोशीला” निमाड़ी के रचनाकार ही नहीं हैं, बल्कि निमाड़ी के चिन्तक भी हैं । उनके जेहन में निमाड़ी के विकास को लेकर निरन्तर कुछ न कुछ संकल्प सदैव रहता है | वे निमाड़ी के लिए एक समर्पित साधक हैं । वे दिन रात निमाड़ी “भाषा” का स्वप्न देखते हैं । उनका मानना है कि जब तक निमाड़ी साहित्य का भण्डार नहीं भरता तब तक निमाड़ी भाषा नहीं बन सकती । हजारों हाथों से निमाड़ी में अधिक से अधिक विविध विधाओं में साहित्य लिखा नहीं जाता है तब तक साहित्य में निमाड़ी का स्थान नहीं बन सकता । इसके लिये स्वयं यथासंभव प्रयत्नशील हैं, वे निमाड़ी में गीत, कविता, कहानी , नाटक, उपन्यास, संस्मरण, निबन्ध आदि निरन्तर लिख रहे हैं । उनकी हिन्दी व निमाडी में लगभग 26 पुस्तकें आ चुकी हैं।
श्री जगदीश “जोशीला” के भीतर निमाड़ को लेकर एक आग भी है, एक ज़ज्बा है । निमाड़ के लोगों का भीरूपन, समय के साथ न चलने की जड़ता, निरक्षरता और पिछड़ापन उनके कवि-लेखक को सालता है । उनके मन में एक बेचैनी है, जो विविध विधाओं के सृजन में प्रकट होती है । वे निमाड़ को असहाय, पिछड़ा और अज्ञानी नहीं देखना चाहते । वे उस निमाड़ को विकसित रूप में देखना चाहते हैं जिसके पास उसकी गौरवशाली संस्कृति और अतीत है । निमाड़ लोक की अक्षय वाचिक संस्कृति परम्परा है । इस अमूल्य धरोहर को संकलित और संरक्षण देनेवाले लोग हों । वे ऐसा नेता चाहते है जो केवल वोटजीवि न होकर संस्कृति जीवि भी हो । वह निमाड़ और निमाड़ी को भूल न जाये । वे समय पर पैनी नजर रखते हैं । इसलिए अपनी भाषा – बोली में व्यंग्य लिखते हैं, समाज की विद्रूपताओं से लोगों को सजग करते हैं । इससे ऊपर जगदीश “जोशीला” कविता के हामी हैं, जो उनकी प्रतिबद्धता है । ,
ठेठ गांव से लगाकर देश की राजधानी तक आज जिस तरह का माहोल है, वह हर किसी को उद्विग्न करने वाला है, फिर कवि की संवेदना का क्या कहना ? “आद्धर सी हेटऽ तक” यानी ऊपर से नीचे तक ऐसी ही कृति है,जिसमें गांव के पंच, सरपंच, जनपद, जिला, विधायक, सांसद, नेता, अफसर, कर्मचारी आदि के नकली चरित्र को १८४ छंदो में उजागर किया गया है | शुरुआत होती है –
यहां परजातन्तर का राज मंऽ
कमती हुयाज अवंऽ खतरा ।
नेतागिरी करण्या बन्नम
बणी गयाज खोब चतरा ॥
चोर वरसूदी करी रयाज
हमरा बणी नंऽ चोकिदार ।
हत्या, लूट, चोरी, डकेती
नंऽ धन की छे मारम्मार ॥
लायक डोबरो पकड़ी नंऽ रड़ऽ
राज चलऽज नालायक सी |
जादा माल चिरणूं होय तो
रास मिलाओ विधायक सी॥
नई उपमा के साथ कवि कह उठता है –
कड़वी तुमड़ी मंऽ मिट्ठा ढूंढां
जबकि सब छे बीज कड़वा |
देव बणी नंऽ ‘ स्यां स्यां स्यां ‘ घुमऽ
देस भर मंऽ नकली बड़वा ॥
ऊपर पहुँचकर भला आदमी भी किस तरह बेईमान हो जाता है और जीवन के मूल्यों को बचाने के बजाय उसका बेशर्म व्यापारी बन जाता है।
आदूघर जातऽ ज ‘भलो माणुस’ बी
देखतऽ देखतड बणऽज ढोर |
चोर नंऽ की टोळई मंऽ मिली नंऽ
बस, गग्गावऽज चोर-चोर ॥
नैतिक पतन के दौर में आदमी से आदमी का भरोसा उठ गया । जिन पर भरोसा होना था, वे ही देश पर सेंध लगा रहे हैं । अर्थ और स्वार्थ की दुनिया पनप रही है । लूट, हत्या और आतंक का बोलबाला हो गया है । चारों ओर भय का वातावरण फैला हैं । ये चिन्ताएं “आद्धर सी हेटऽ तक” के रचनाकार को है । उसे अभी भी विश्वास है कि कोई महाकाल इसका हिसाब करके सब बराबर कर देगा।
पूर का पयलऽ नेता होण
बाँदो रे अबी सी पाळ |
तमरा सबज करम को हिसाब
राखी रयोज महाकाळ ॥
कवि सच को सच कहने की ताकत रखता है । कविता में सच का आना समय को रेखांकित करना है । “जोशीला” ने अपने समय के सच को कविता में उतार दिया है । साधुवाद |
श्री जगदीश जोशिला: पद्मश्री 2025 सम्मानित निमाड़ी साहित्यकार
श्री जगदीश जोशिला हिंदी और निमाड़ी साहित्य के प्रतिष्ठित साहित्यकार व निमाड़ी गद्य विधा के जनक हैं। उन्हें भारत के पहले और एकमात्र निमाड़ी उपन्यासकार के रूप में व्यापक मान्यता प्राप्त है। पिछले पाँच दशकों में उन्होंने 56 पुस्तकें (28 हिंदी व 28 निमाड़ी में) लिखकर निमाड़ की समृद्ध संस्कृति व विरासत को सहेजने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
उनकी लेखनी केवल साहित्य तक सीमित नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम व गुमनाम शहीदों के इतिहास पर भी शोध करती है। उनकी रचनाएँ ऐतिहासिक तथ्य व रचनात्मकता का अनूठा संगम हैं। उनके योगदानों के लिए उन्हें ईस्वरी पुरस्कार (2007), पं. बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ पुरस्कार (2016) और संत सिंगाजी पुरस्कार (2019) से सम्मानित किया गया।
2010 में पद्मश्री के लिए अनुशंसित श्री जोशिला को 2025 में भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से सम्मानित किया गया, जिससे उनकी साहित्यिक व ऐतिहासिक सेवाओं को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली। उनका कार्य भारतीय क्षेत्रीय साहित्य पर अमिट छाप छोड़ते हुए भविष्य की पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।









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