निमाड़ी भाषा का गौरवपूर्ण इतिहास और वर्तमान संघर्ष

भक्तिकाल और संत परंपरा

सन् 1319 से 1644 तक भारत में एक अत्यंत समृद्ध भक्ति काल रहा, जो लगभग 325 वर्षों तक चला। इस कालखंड में अनेक संत कवि उत्पन्न हुए, जिन्होंने भारतीय संस्कृति और धर्म को नई दिशा दी। तुलसीदास, सूरदास, कबीर, नरसी मेहता, मीरा बाई जैसे संतों ने जन-जन को भक्ति के माध्यम से जोड़ा। इसी काल में मध्यप्रदेश के निमाड़ क्षेत्र में संत सिंगाजी का जन्म हुआ।

संत सिंगाजी: भक्ति और अद्वैत का संगम

संत सिंगाजी का जन्म 1519 में हुआ और उन्होंने 1559 में स्वैच्छिक समाधि ली। मात्र 40 वर्ष की आयु में उन्होंने जिस तरह जीवन को पूर्ण किया, वह भीष्म पितामह की ऐच्छिक मृत्यु जैसी प्रेरणादायक घटना थी। संत सिंगाजी ने निर्गुण भक्ति मार्ग अपनाते हुए शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन को निमाड़ी लोकभाषा में प्रस्तुत किया। उनके गीत, भजन और साहित्य ने स्थानीय जनता को गहराई से प्रभावित किया।

निमाड़ी भाषा की उपेक्षा

1947 में देश की आज़ादी के बाद विभिन्न लोकभाषाओं को साहित्यिक मान्यता दी गई—अवधी, ब्रज, राजस्थानी, पंजाबी, गुजराती, मराठी आदि। परंतु दुर्भाग्यवश निमाड़ी भाषा को इस मान्यता से वंचित रखा गया। यह विडंबना तब और गहरी होती है जब यह देखा जाए कि संत सिंगाजी जैसे महान संत इसी भाषा में बोले और लिखे।

निमाड़ लोक साहित्य परिषद की स्थापना

1953 में निमाड़ के भाषा प्रेमियों ने “निमाड़ लोक साहित्य परिषद” की स्थापना की ताकि निमाड़ी को राजभाषा का दर्जा दिलवाया जा सके। यह संस्था कई दशकों तक सक्रिय रही, और 2001 में इसे पुनर्जीवित कर नई ऊर्जा के साथ प्रयास शुरू किए गए।

राजभाषा मान्यता की प्रक्रिया और प्रयास

भारत सरकार ने बताया कि किसी भी बोली को भाषा की मान्यता देने के लिए उस भाषा का साहित्य, शब्दकोश, व्याकरण और मानक होना आवश्यक है। परिषद ने इन सभी बिंदुओं पर कार्य करते हुए 2010 में एक पूर्ण दस्तावेज भारत सरकार को भेजा। हालांकि, संविधान के अनुच्छेद 345 के तहत यह अधिकार राज्य सरकार का होता है, इसलिए यह प्रस्ताव मध्यप्रदेश सरकार को भेजा गया, लेकिन आज तक कोई उत्तर नहीं मिला।

निमाड़ी साहित्य का नवजागरण

परिषद के प्रयासों से निमाड़ी साहित्य में नवजागरण आया। विभिन्न साहित्यकारों ने कविता, कहानी, उपन्यास, गद्य और अन्य विधाओं में लेखन प्रारंभ किया। लेखक स्वयं ने पहला निमाड़ी उपन्यास भलाई की जड़ पाताल मा लिखा, जो अत्यंत लोकप्रिय हुआ और अन्य साहित्यकारों को प्रेरणा दी।

निमाड़ी भाषा और विश्वविद्यालय की आवश्यकता

मध्यप्रदेश की चार प्रमुख लोकबोलियाँ—निमाड़ी, मालवी, बुंदेली, और बघेली हैं। परंतु निमाड़ क्षेत्र में आज तक एक भी विश्वविद्यालय नहीं है, जबकि अन्य क्षेत्रों में अनेक विश्वविद्यालय हैं। यह असंतुलन भाषा और संस्कृति के संवर्धन में बाधा है।

हस्ताक्षर अभियान और सरकार को ज्ञापन

एक व्यापक हस्ताक्षर अभियान के तहत लगभग 5000 लोगों से आधार और मोबाइल नंबर सहित हस्ताक्षर करवा कर ज्ञापन तैयार किया गया। यह ज्ञापन मुख्यमंत्री, शिक्षा मंत्री और संस्कृति मंत्री को भेजा गया। इस प्रयास का परिणाम यह हुआ कि तत्कालीन शिक्षा मंत्री मोहन यादव, जो अब मुख्यमंत्री हैं, ने निमाड़ क्षेत्र को विश्वविद्यालय की सौगात दी।

क्रांतिवीर टंट्या भील विश्वविद्यालय: एक नई शुरुआत

फरवरी माह में मुख्यमंत्री ने खरगोन में क्रांतिवीर टंट्या भील विश्वविद्यालय की घोषणा की। यह विश्वविद्यालय निमाड़ी भाषा और संस्कृति के पुनरुद्धार का केंद्र बन सकता है। यह अपेक्षा है कि निमाड़ी को भी अन्य बोलियों की तरह उच्च शिक्षा में स्थान मिलेगा।

भविष्य की दिशा और उम्मीद

अब जब नींव तैयार हो चुकी है, तो साहित्यकारों के सहयोग से एक सशक्त भवन निर्माण की आवश्यकता है। निमाड़ी को राजभाषा का दर्जा दिलाने के लिए निरंतर संघर्ष, लेखन और जनजागरण की आवश्यकता है। यह संघर्ष केवल एक भाषा के लिए नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक अस्मिता के लिए है।

समापन और आह्वान

लेखक गर्वपूर्वक कहते हैं कि निमाड़ की धरती पर जन्म लेना तब सार्थक होगा जब निमाड़ी को उसका सही स्थान मिलेगा। ईश्वर से प्रार्थना और साहित्यकारों से निवेदन है कि तन, मन, धन और जन से इस अभियान को आगे बढ़ाएं ताकि संत सिंगाजी की निमाड़ी को वह सम्मान मिले जिसकी वह हकदार है।

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