आठवीं शताब्दी तक सम्पूर्ण भारतवर्ष सैकड़ों छोटी-छोटी रियासतों (राज्यों) में वेदों के ज्ञान को अलग-अलग ऋषियों ने अपने-अपने अनुसार व्याख्या करके विभिन्न मतों को जन्म दिया हुआ था। अलग-अलग मतों को सत्य सिद्ध करने में जन सामान्य भ्रमित होकर दिशाहीन हुआ था और परस्पर द्वेष में वृद्धि हुई थी।
इनमें मुख्यतः कपिल ऋषि का सांख्य दर्शन, गौतम ऋषि का न्याय दर्शन, कषाद ऋषि का वैशेषिक दर्शन, जैमिनी ऋषि का मीमांसा दर्शन, पतंजली ऋषि का योगदर्शन तथा अभिनव गुप्त, आनन्द गिरी, कुमारिल भट्ट, मंडन मिश्र, चार्वाक, शैव, शाक्त, वैष्णव, कापालिक, वाममार्गी, तान्त्रिक आदि थे तथा बौद्ध मत और जैन मत वेद विरुद्ध प्रचार करते हुए वैदिक धर्म को क्षति पहुँचाये हुए थे। तब भारतवर्ष में धार्मिक एकता विखण्डित होकर जनसामान्य अशान्त, दुखी व त्रस्त था ।
इसी समय भारत के केरल प्रदेश के एक गांव कालड़ी में नम्बुदरि ब्राह्मण शिवगुरू व उनकी पत्नी विशिष्ठा देवी ने शिव आराधना करके शंकर नामक अल्पायु किन्तु सर्वगुण सम्पन्न, महान पुत्र शंकर को जन्म दिया। उस बालक ने छः सात वर्ष की अल्पायु में ही वेदों, पुराणों, उपनिषदों एवं शास्त्रों का अध्ययन करके कंठस्थ किया और अपने केवल बत्तीस वर्ष के जीवन वय की मरणावस्था तक में वेद आधारित सनातन वैदिक धर्म व अद्वैत मत को स्थापित करके पुर्नजीवन प्रदान किया।
उन्होंने केरल से कश्मीर तक तथा द्वारिका से आसाम तक दुष्कर पदयात्रा करके राष्ट्र के विभिन्न मतावलम्बियों से अपने ज्ञान, प्रतिभा, तर्कशक्ति, शास्त्र प्रमाणों, उदाहरणों एवं दृष्टान्तों द्वारा शास्त्रार्थ में पराजित करके अद्वैत मत व सनातन वैदिक धर्म का अनुयायी बनाकर चरमराई हुई सामाजिक व्यवस्था को नवजीवन तो दिया ही साथ ही दबे-कुचले वर्ग एवं स्त्रियों को समता व सम्मान दिलाकर सर्वमान्य और प्रतिष्ठित किया ।
इस विराट ऐतिहासिक व्यक्तित्व पर मेरी उपन्यास लिखने की प्रबल मानसिकता इसलिये भी बनी कि शंकराचार्य जी ने केवल आठ वर्ष की बाल्यावस्था में ठेठ केरल से अकेले पैदल चलकर मध्य भारत के दक्षिण-पश्चिम में स्थित (अनपू देश) निमाड़ जनपद के ओंकारेश्वर ज्योर्तिलिंग में आकर श्रेष्ठ गोविन्द पादाचार्य जी से दीक्षा लेकर सनातन वैदिक धर्म व अद्वैत मत में परिपक्वता प्राप्त की थी।






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